Sahih Muslim || Hadees in Hindi हदीस की अच्छी-अच्छी बातें New || Hadees in Hindi
1 हज़रत याला बिन शद्दाद फ़रमाते हैं कि मेरे वालिद हज़रत शद्दाद ने यह वाक़िया ब्यान फ़रमाया और हज़रत उबादा जो कि उस वक्त मौजूद थे, इस वाक़िया की तस्दीक़ फ़रमाते हैं कि एक मर्तबा हम लोग नबी करीम की ख़िदमत में हाज़िर थे । रसूलुल्लाह ने दरयाफ़्त फ़रमाया : कोई अजनबी (गैर मुस्लिम) तो मजमा में नहीं? हमने अर्ज़ किया, कोई नहीं । इर्शाद फ़रमाया दरवाजा बन्द कर दो। उसके बाद इर्शाद फ़रमाया हाथ उठाओं और कहो ला इला-ह इल्लल्लाह । हमने थोड़ी देर हाथ उठाये रखे (और कलिमा तैयिबा पढ़ा), फिर आप ने अपना हाथ नीचे कर लिया। फिर फ़रमाया : 'अल-हम्दु लिल्लाह, ऐ अल्लाह ! आपने मुझे यह कलिमा देकर भेजा है और इस (कलिमा की तब्लीग़) का मुझे हुक्म फ़रमाया है और इस कलिमा पर जन्नत का वादा फ़रमाया है और आप वादा ख़िलाफ़ नहीं हैं। इसके बाद रसूलुल्लाह ने हम से फ़रमाया: ख़ुश हो जाओ, अल्लाह तआला ने तुम्हारी मफ़िरत फ़रमा दी। (मुस्नद अहमद, तवरानी, बज़्ज़ार, मज्मउज्जवाइद)
2 हज़रत अबूज़र से रिवायत है कि नबी करीम ने इर्शाद फ़रमाया : जो बन्दा ला इला-ह इल्लल्लाह कहे और फिर उसी पर उसकी मौत आ जाए तो वह जन्नत में ज़रूर जाएगा। मैंने अर्ज़ किया : अगरचे उसने जिना किया हो, अगरचे उसने चोरी की हो? आप ने इर्शाद फ़रमाया (हाँ) और ।,अगरचे उसने जिना किया हो, अगरचे उसने चोरी की हो। फ़िर मैंने अर्ज़ किया: अगरचे उसने जिना किया हो, और उसने चोरी की हो आप صلى الله عليه وسلم ने इर्शाद फ़रमायाःा अगरचे उसने ज़िना किया
हो, अगरचे उसने चोरी की हो। मैंने अर्ज किया : अगरचे उसने जिना किया हो अगरचे उसने चोरी की हो? आप ने इर्शाद फ़रमाया : अगरचे उसने ज़िना किया हो, अगरचे उसने चोरी की हो, अबूज़र के अलर्रग्म वह जन्नत में ज़रूर जाएगा।
(बुख़ारी)
फायदा : अलर्रम अरबी जुबान का एक ख़ास मुहावरा है। उसका मतलब यह है कि अगर तुम्हें यह काम नागवार भी हो और तुम उसका न होना भी चाहते हो, तब भी यह हो कर रहेगा। हज़रत अबूज़र को हैरत थी कि इतने बड़े-बड़े गुनाहों के बावजूद जन्नत में कैसे दाख़िल होगा, जबकि अल का तक़ाज़ा यही है कि गुनाहों पर सजा दी जाए, लिहाजा नबी करीम ने उनकी हैरत दूर करने के लिए फ़रमाया, ख़्वाह अबूज़र को कितना ही नागवार गुज़रे, वह जन्नत में ज़रूर दाख़िल होगा। अब अगर उसने गुनाह भी किए होंगे तो ईमान के तकाज़े से वह तौबा- इस्तरफ़ार करके गुनाह माफ़ करा लेगा या अल्लाह तआला अपने फल से माफ़ फ़रमा कर बगैर किसी अज़ाब के ही या गुनाहों की सज़ा देने के बाद बहरहाल जन्नत में ज़रूर दाखिल फ़रमाएंगे ।
उलमा ने लिखा है कि इस हदीस शरीफ़ में कलिमा 'ला इला-ह इल्लल्लाह' कहने से मुराद पूरे दीन व तौहीद पर ईमान लाना है और उसको अख्तियार करना है । (मआरिफुल हदीस)
3 हज़रत अबू हुरैरह से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ने इर्शाद फ़रमाया ,: जिसने 'ला इला-ह इल्लल्लाह' कहा, उसको यह कलिमा एक न एक दिन जरूर फ़ायदा देगा, (नजात दिलाएगा), अगरचे उसको कुछ-न-कुछ सजा पहले भुगतना पड़े ।
(वज़्ज़ार, तवरानी, तर्गीब)
4 हज़रत हुज़ैफ़ा से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ने इर्शाद फ़रमाया : जिस तरह कपड़े के नक्श व निगार घिस जाते हैं और मांद पड़ जाते हैं, उसी तरह इस्लाम भी एक ज़माने में मांद पड़ जाएगा, यहां तक कि किसी शख्स को यह इल्म तक न
रहेगा कि रोज़ा क्या चीज़ है और सदक़ा व हज क्या चीज? एक शब आएगी कि क़ुरआन सीनों से उठा लिया जाएगा और ज़मीन पर उसकी एक आयत भी बाक़ी न रहेगी। अलग-अलग तौर पर कुछ बूढ़े मर्द और कुछ बूढ़ी औरतें रह जाएंगी जो यह कहेंगी कि हमने अपने बुजुगों से यह कलिमा ला इला-ह इल्लल्लाह सुना था, इसलिए हम भी यह कलिमा पढ़ लेते हैं। हज़रत हुज़ैफ़ा के शागिर्द सिला ने पूछाः जब उन्हें रोज़ा, सदक़ा और हज का भी इल्म न होगा तो भला सिर्फ़ यह कलिमा उन्हें क्या फ़ायदा देगा? हज़रत हुज़ैफ़ा ने उसका कोई जवाब न दिया। उन्होंने तीन बार यही सवाल दुहराया, हर बार हज़रत हुज़ैफ़ा एराज़ करते रहे, उनके तीसरी मर्तबा ( इसरार ) के बाद फ़रमाया सिला! यह कलिमा ही उनको दोज़ख़ से नजात दिलाएगा।
(मुस्तदरक हाकिम)
4. हज़रत इब्ने शिमासा महरी रहमतुल्लाह अलैह से रिवायत है कि हम हज़रत अनू बिन आस के पास उनके आखिरी वक्त में मौजूद थे। वह जार-व-क़तार रो रहे थे और दीवार की तरफ़ अपना रुख किए हुए थे। उनके साहिबज़ादे उनको तसल्ली देने के लिए कहने लगे, अब्बा जान! क्या नबी करीम ने आप को फ़्लां बशारत नहीं दी थी? क्या रसूलुल्लाह ने आप को फ़्लां बशारत नहीं दी थी? यानी आपको तो नबी करीम ने बड़ी-बड़ी बशारतें दी हैं। यह सुनकर उन्होंने (दीवार की तरफ़ से) अपना रुख बदला और फ़रमाया, सबसे अफ़ज़ल चीज जो हम ने ( आख़िरत के लिए) तैयार की है वह इस बात की शहादत है कि अल्लाह तआला के सिवा कोई माबूद नहीं और मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं। मेरी ज़िन्दगी के तीन दौर गुजरे हैं। एक दौर तो वह था जबकि रसूलुल्लाह से बुग्ज़ रखने वाला मुझसे ज्यादा कोई और शख़्स न था और जबकि मेरी सबसे बड़ी तमन्ना यह थी कि किसी तरह आप पर मेरा क़ाबू चल जाए तो मैं आप को मार डालूं । यह तो मेरी ज़िन्दगी का सबसे बतदर दौर था, (ख़ुदा न ख्वास्ता) मैं इस हाल पर मर जाता तो यक़ीनन दौज़खी होता। इसके बाद जब अल्लाह तआला ने मेरे दिल में इस्लाम का हक़ होना डाल दिया तो मैं आप के पास आया और मैंने अर्ज किया, अपना मुबारक हाथ बढ़ाइए ताकि मैं आप से बैस्त करूं। आप ने अपना हाथ मुबारक बढ़ा दिया। मैंने अपना हाथ पीछे खींच लिया। आपने फ़रमाया, अनू यह क्या? मैंने अर्ज़ किया, मैं कुछ शर्त लगाना चाहता हूं। फ़रमाया क्या शर्त लगाना चाहते हो? मैंने कहा, यह कि मेरे सब गुनाह माफ़ हो जाएं। आप ने इर्शाद फ़रमाया अप्रू! क्या तुम्हें ख़बर नहीं कि इस्लाम तो कुफ की ज़िन्दगी के गुनाहों का तमाम क़िस्सा ही पाक कर देता है; और हिजरत भी पिछले तमाम गुनाह माफ़ कर देती है; और हज भी पिछले सब गुनाह ख़त्म कर देता है। यह दौर वह था जबकि आपसे ज़्यादा प्यारा, आपसे ज़्यादा बुजुर्ग व बरतर मेरी नजर में कोई और न था। आपकी अजमत की वजह से मेरी यह ताव न थी कि कभी आप को नज़र भर कर देख सकता, अगर मुझसे आपकी सूरत मुबारक पूछी जाए तो मैं कुछ नहीं बता सकता, क्योंकि मैंने कभी पूरी तरह आपको देखा ही नहीं। काश! अगर मैं इस हाल पर मर जाता तो उम्मीद है कि जन्नती होता। फिर हम कुछ चीज़ों के मुतवल्ली और जिम्मदार बने और नहीं कह सकते कि हमारा हाल उन चीज़ों में क्या रहा (यह मेरी ज़िन्दगी का तीसरा दौर था । अच्छा देखो, जा
मेरी वफ़ात हो जाए तो मेरे जनाजे के साथ कोई वावेला और शोर व शराब करने वाली औरत न जाने पाए, न ( ज़माना जाहिलियत की तरह) आग मेरे जनाज़े के साथ हो। जब मुझे दफ़न कर चुको तो मेरी क़ब्र पर अच्छी तरह मिट्टी डालना और जब (फ़ारिग हो जाओ) तो मेरी कब्र के पास इतनी देर ठहरना जितनी देर में ऊंट जवह करके उसका गोश्त तकसीम किया जाता है, ताकि तुम्हारी वजह से मेरा दिल लगा रहे और मुझे मालूम हो जाए कि मैं अपने रब के भेजे हुए फ़रिश्तों के सवालात के जवाबात क्या देता हूं।
(मुस्लिम)
5 हज़रत अब्दुल्लाह बिन उमर से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ने इर्शाद फ़रमाया : क्या मैं तुम्हें वह वसीयत न बताऊं जो (हज़रत नूह ने अपने बेटे को की थी? सहाबा ने अर्ज़ किया ज़रूर बताइए। इर्शाद फ़रमाया
हज़रत नूह ने अपने बेटे को वसीयत में फ़रमायाः मेरे बेटे! तुम को दो काम करने की वसीयत करता हूं और दो कामों से रोकता हूं। एक तो मैं तुम्हें ला इला-ह इल्लल्लाह के कहने का हुक्म देता हूं, क्योंकि अगर यह कलिमा एक पलड़े में रख दिया जाए और तमाम आसमान व जमीन को एक पलड़े में रख दिया जाए तो कलिगा वाला पलड़ा झुक जाएगा और अगर तमाम आसमान व जमीन का एक घेरा हो जाए, तो भी यह कलिमा इस घेरे को तोड़ कर अल्लाह तआला तक पहुंच कर रहेगा। दूसरी चीज़ जिसका हुक्म देता हूं वह 'सुब्हानल्लाहिल अज़ीम व बिहम्दिहि' का पढ़ना , क्योंकि यह तमाम मख़्तूक़ की इबादत है और इसी की बरकत से मख़लूक़ात को रोज़ी दी जाती है। और मैं तुम को दो बातों से रोकता हूं शिर्क से और तकब्बुर से, क्योंकि ये दोनों बुराइयां बन्दे को अल्लाह से दूर कर देती हैं ।
( बज़्ज़ार, मज्मउज्जवाइद)
6 हज़रत अबू हुरैरह से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ने इर्शाद फ़रमाया : जिसने 'ला इला-ह इल्लल्लाह' कहा, उसको यह कलिमा एक न एक दिन जरूर फ़ायदा देगा, (नजात दिलाएगा), अगरचे उसको कुछ-न-कुछ सजा पहले भुगतना
7 हज़रत तलहा बिन उबैदुल्लाह से रिवायत है कि नबी करीम ने इर्शाद फ़रमाया : मैं एक ऐसा कलिमा जानता हूं, जिसे ऐसा शख़्स पढ़े जिसकी मौत का वक्त क़रीब हो तो उसकी रूह जिस्म से निकलते वक्त इस कलिमा की बदौलत ज़रूर राहत पाएगी और वह कलिमा उसके लिए क़ियामत के दिन नूर होगा। ( वह कलिमा 'ला इला-ह इल्लल्लाह' है) ( अबू याला, मज्मउज्जवाइद)
8 हज़रत अनस से रिवायत है कि रसूलुल्लाह ने इर्शाद फ़रमायाः हर वह शख़्स जहन्नम से निकलेगा जिसने ला इला-ह इल्लल्लाह कहा होगा और उसके दिल में एक जौ के वज़न के बराबर भी भलाई होगी यानी ईमान होगा, फिर वह शख़्स
जहन्नम से निकलेगा जिस ने ला इला-ह इल्लल्लाह कहा होगा और उसके दिल में गंदुम के दाने के बराबर भी ख़ैर होगी, यानी ईमान होगा, फिर हर वह शख़्स जहन्नम से निकलेगा जिसने ला इला-ह इल्लल्लाह कहा होगा और उसके दिल में ज़र्रा बराबर भी ख़ैर होगी।
(बुख़ारी)
9 हज़रत अब्दुल्लाह बिन मसूद रज़ियल्लाहु अन्हा से वर्णित है कि उन्होंने कहा: जब अल्लाह के रसूल (सल्लल्लाहु अलैहि व सल्लम) अली की चटाई पर लेट गए, तो उनके निशान उनके शरीर पर दिखाई दिए। धन्य शरीर। मैंने कहा: अल्लाह के रसूल! यदि आप हमें बताते तो हम आपके लिए कुछ (बिस्तर आदि) बिछा देते जो आपको इससे (चटाई की कठोरता) से बचाते। अल्लाह के रसूल ने ले लिया जो हमने कहा: "दुनिया के साथ मेरा क्या संबंध है!" मेरी और दुनिया की मिसाल उस मुसाफ़िर की तरह है जो छाँव के लिए दरख़्त के नीचे ठहरता है, फिर उसे छोड़कर चला जाता है।
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