हजरत इब्राहिम अलैहिस्सलाम का वाकया || Hazrat Ibrahim ka Waqia in hindi 2024

 Hazrat Ibrahim Ali salam ka Waqia full Story in Hindi



हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का वाकया


दोस्तों और अज़ीज़ साथियों- हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ज़िक्र क़ुरआन शरीफ में 68 जगह आया है, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम बहुत ही बड़े नबी गुज़रे हैं, दुनिया में जब बुत प्रम्ती का ज़ोर हो गया, लोग बुतों को बनाते और खुद उनकी पूजा करते हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के वालिद भी बुत बनाते थे, और बुतों को खुदा समझते थे।





हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अभी बच्चें ही थे, वह देखते कि मेरे वालिद और दूसरे लोग खुद ही मिट्टी और लकड़ी से बुतों को बनाते हैं, और फिर उनको ख़ुदा समझने लगते हैं, वह हैरान हुए कि किस जिले कद्र बेवकूफ़ हैं, यह सब लोग कि इन बे-जान मूर्तियों को खुदा समझ रहे हैं।


हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का बुर्तों को तोड़ना हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम उन लोगों से कहते कि तुम लोग क्यों इन बुतों को पूजते हो, यह तुम्हें न कोई नफा दे सकते हैं न नुक्सान। मगर वह जवाब देते कि जो हमारे बाप-दादा करते हैं वही हम कर रहे हैं।


बच्चो! एक रोज़ उन लोगों का शहर मे बाहर कोई बड़ा मेला हुआ यह सब लोग उम मेले में शरीक होने शहर से चले गए, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम उस मेले में न गए. उनके पीछे हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम मुल्क के बड़े बुत खाने में गए और यहां के सब बुतों को तोड़ डाला सिवाए एक मबसे बड़े बुत के, और कुलहाड़ी जिससे सब बुतों को नोड़ा था वह उस बड़े बुत के कंधे पर रख दी जिससे यह मालूम होना था कि यह सब उसी ने तोड़े हैं।


लोग जब वापस आए और उन्होंने बुतों की यह दुरगत देखी कि किसी का सर नहीं है तो किसी का पैर नहीं तो बहुत गुस्सा हुए कि यह हरकत किसने की है, सबने शुबहा हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम पर किया कि वही बुतों को हुए कहते थे, और मेले में भी नहीं गए


थे आखिर उनको बुला कर पूछा कि यह बुत किसने तोड़े हैं, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने जवाब दिया कि मुझ से पूछने के बजाए अपने खुदाओं से क्यों नहीं पूछते जिनकी तुम इबादत करते हो। कि उनको किसने तोड़ा है वह खुद बता देंगे।


इन लोगों ने जवाब दिया कि आप को मालूम है कि यह बोल नहीं सकते, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने कहा कि फिर तुम ऐसे बेकार ख़ुदाओं की पूजा करते हो। हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने फिर कहा कि देखो कुल्हाड़ी बड़े बुत के कंधे पर रखी है, यह काम इसी का मालूम होता है, इससे गूटां, यह लोग बहुत नाराज़ हुए, और उनके बाप आज़र में शिकायत की कि तुम्हारा बेटा ऐसी हरकत कर रहा है इसको समझा लो बना अच्छा न होगा।


हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने बाग को भी समझाया, और प्रस्ती से मना किया, और अर्ज़ किया कि ऐ वाप मैं डरता बुत हूँ कि तुम पर ख़ुदा का कोई अज़ाब नाज़िल न हो, इस पर उनके बाप बहुत सख्त नाराज हुए और कहा कि आईंदा तूने मुझ से कोई ऐसी बात कहीं तो मैं तुझे संगसार कर दूंगा, और कहा कि तू मेरे पास में हमेशा के लिए चला जा, आपने बाप को सलाम किया और कहा कि मैं चला जाता हूं लेकिन तुम्हारे लिए मगफिरत की दुआ करता रहूंगा।


हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और आग


दोस्तों ! फिर क्या हुआ, वहां के बादशाह नमरुद को जो बहुत ज़ालिम और बुतप्रस्त था, इन सब बातों का पता चला कि आज़र का बेटा इब्राहीम लोगों को बुतों की पूजा से मना करता है और एक ख़ुदा की दावत देता है तो उसने उनको अपने दरबार में बुलाया, और आप से झगड़ने लगा । 


हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि मेरा खुदा तो वही हैं जो मारता भी और जिलाता भी है।


नमरूद ने कहा मैं भी मार सकता हूं और जिला सकता हूँ, चूनांचे उसने एक कैदी को जिसको सजाए मौत का हुक्म हो चुका था आज़ाद कर दिया और एक बेगुनाह को पकड़ कर कत्ल करा दिया और कहा कि अब बताओ मेरे और तुम्हारे ख़ुदा के दरमियान क्या फर्क है, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने कहा कि मेरा रब हर रोज़ सूरज मशरिक से निकालता है तुम उसे मगरिब से निकाल दो इस पर नमरूद लाजवाब हो गया और हुक्म दिया कि इब्राहीम अलैहिस्सलाम को जिन्दा जला दिया जाए चूनांचे बहुत सी लकड़ीया इक्ट्ठी की गई और इनमें आग लगाई गई। जब आग बहुत भड़क उठी और उसके शुअले आसमान की ख़बर लाने लगे तो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को इसमें फेंक दिया गया, मगर वह आग ख़ुदा के हुक्म से ठंडी हो गई, और आपको आग से कोई तकलीफ़ नहीं पहुंची।


बच्चो ! इस तरह जो लोग अल्लाह तआला के कहने पर चलते हैं. अल्लाह पाक उनको हर तकलीफ से बचा लेते हैं और उनके लिए आसानियां ही आसानियां हो जाती हैं, और जो लोग अल्लाह तआला का कहना नहीं मानते उनके लिए इस दुनिया में मुश्किल ही मुश्किल होता है और मरने के बाद तो हमेशा जहन्नम में रहेंगे।


हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और ज़मज़म हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अल्लाह के हुक्म से हज़रत हाजरा और अपने बच्चे हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम को जो अभी



पैदा हुए थे एक ऐसी जगह छोड़ आए जहां दूर-दूर तक आबादी न थी और न पानी था और न कोई दरख़्त था, हज़रत हाजरा ने हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम को एक पत्थर के साया में लिटाया और खुद पानी की तलाश में इधर-उधर दौड़ें लेकिन पानी न मिला, खुदा की क़ुदरत से जहां हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम ऐड़ियां रगड़ रहे थे वहां पानी का चश्मा फूट निकला, जो आज तक ज़मज़म के नाम से मशहूर है, और हज़रत हाजरा जहां दौड़ीं थीं उसे सफा व मर्वा कहते हैं जहां जाकर आज हाजी इसी तरह दौड़ते हैं।


हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और कुर्बानी


हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम कुछ बड़े हुए तो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को अल्लाह की तरफ से यह हुक्म हुआ कि अपने बेटे इस्माईल अलैहिस्सलाम को मेरी राह में कुर्बान कर दो, चूनांचे आपने हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम को यह बात बताई हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम ने कहा कि अब्बा जान अल्लाह तआला आपको जो हुक्म दे रहा है उसको ज़रूर पूरा कीजिए, आप इंशा अल्लाह मुझे माबित क़दम पाएंगे।


चूनांचे हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम अपने बेटे इस्माईल अलैहिस्सलाम को ज़िब्ह करने के लिए लेकर चले और जंगल में ले जा कर उनको उल्टा लिटाया और अपनी आंखों पर पट्टी बांध ली कि कहीं बेटे की मुहब्बत अल्लाह के हुक्म को पूरा करने से न रोके और गले पर छुरी चला दी, उसी वक्त आवाज़ आई कि ऐ इब्राहीम तूने हमारे हुक्म को सच्चा कर दिखाया, और जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने आंखों से पट्टी खोली तो हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम के बजाए एक दुंबा ज़िब्ह किया हुआ पड़ा था इसी किआ की

याद में मुसलमान हर साल कुर्बानी करते हैं।

 

दोस्तो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाभ और हज़रत इम्माईल अलैहिस्सलाम की ज़िन्दगी से हम को बहुत सबक मिलते हैं, हज़रत इब्राहीम ने हम को सिखाया कि अल्लाह की रंज़ा के लिए मां-बाप को छोड़ा जा सकता है, अपने मुल्क और बिरादरी को ख़ैर बाद कहा जा सकता है, अपने बच्चे और बीवी को जंगल में बे-सर व सामान छोड़ कर उनसे भी पीठ फेरी जा सकती है।


दोस्तों ! अल्लाह तआला अगर किसी मुसलमान का इम्तिहान


लेते हैं और उसमें वह कामियाब हो जाता है तो अल्लाह तआला


उसको फिर और ज़ियादा नेमतें देते हैं।





खान-ए-काबा


जब हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाग जवान हुए तो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम और हज़रत इस्माईल अलैहिस्सलाम ने मिल कर खाना काबा को दोबारा तामीर करना शुरू किया, और जब हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अल्लाह तआला में दुआ की ऐ मेरे रब इस शहर को लोगों के लिए अम्न की जगह बना दे, मुझे और मेरी औलाद को बुतों की पूजा से बचाए रख. ऐ हमारे रब मैंने अपनी औलाद को मैदान में जहां खेती नहीं होती तेरे इज़्ज़त वाले घर की खातिर आबाद किया है ताकि ऐ मेरे रब ये नमाज़ पढ़ें, तू लोगों के दिलों को ऐसा कर दे कि इनकी तरफ झुके रहें, और इनकी मेवे दे कि तेरा शुक्र अदा करें।


ऐं परवरदिगार जो बात हम छुपाते हैं और जाहिर करते हैं तू इन सब को जानता है और ख़ुदा से ज़मीन व आसमान में कोई चीज़ छुपी हुई नहीं है, और मेरे रब तू मुझ को तौफ़ीक़ दे कि मैं तेरी



नमाज़ पढ़ता रहूं और मेरी औलाद भी नमाज़ पढ़ती रहे, ऐ मेरे रब मेरी दुआ कबूल फरमा, ऐ मेरे रब हिसाब किताब यानी कियामत के दिन मुझ को और मेरे मां-बाप को और मुमिनों को बता दे।


यह वही ख़ाना काबा है, जहां सारी दुनिया से लाखों मुसलमान हर साल हज करने आते हैं और जिसकी तरफ मुं

ह करके हम सब | मुलमान पांचों वक़्त की नमाज़े अदा करते हैं।





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