Surah Fatiha in Hindi Tarjuma: || सूरह फातिहा हिंदी में

 

Surah Fatiha Tafseer in Hindi: || सूरह फातिहा हिंदी में

सूरह अल फातिहा एक ऐसी सूरह है,  जिसे हर नमाज में पढ़ा जाती है , सूरह अल फातिहा पढ़े बिना नमाज मुकाम्मल नहीं सकती है ,  इस हर नमाज़ मै पड़ना फर्ज़ है , 






फज्र की सुन्नत और फर्ज़ के दर्मियान 41 बार सूरह फातिहा इस तरह पढ़ें , कि बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीमिल हम्दु लिल्लाहि रब्बिल आलमीन इस तरह हर 41 बार पढ़कर मरीज़ पर दम करें और पानी में भी दम करके पिला सकते हैं,इन शा अल्लाह तआला शिफा हासिल होगी   

सुराह  फातिहा  मै हर बिमारी  का इलाज है और सिवाए मौत के 

Surah Fatiha in Hindi

Surah Fatiha ki Fazilat Hindi


अल्लाह न इस मै हर बिमारी की सिफा रखी है 

जो जो शख्स  इस रात को सात मर्तमा पढ़े गए  अल्लाह उसे को हर बिमारी और  बला से महफूज़ रखेगा , 
 रात को सोने से पहले  ७ मर्तबा पढ़ेगा   जरोर पढ़े
इस में बहुत  फादेमंद है , 
 
सूरह फातिहा 
بسم الله الرحمن الرحيم
الحمد لله رب العالمين
الرحمن الرحيم
 مالك يوم الدين
 اياك نعبد واياك نستعين
 اهدنا الصراط المستقيم 
صراط الذين انعمت عليهم 
غير المغضوب عليهم ولا الضالين 
(امين)

SURAH FATIHA IN ENGLISH TRANSRANSLATION


1 In the name of God, the Gracious, the Merciful.
2. Praise be to God, Lord of the Worlds.
3. The Most Gracious, the Most Merciful.
4. Master of the Day of Judgment.
5. It is You we worship, and upon You we call for help.
6. Guide us to the straight path.
7. The path of those You have blessed, not of those against whom there is anger.
nor of those who are misguided
सूरह फ़ातिहा ( Al- Fatiha ) हिंदी मेँ तर्जुमा
(1)❤️ सब तारीफे अल्लाह के लिए है जो सारे संसार का परवरदिगार है
(2) ❤️जो सब पर  मेहरबान  बहुत मेहरबान हैं
(3)🔥 जो रोज़े जजा बदले के दिन का मालिक है,
( 4) 🤲या अल्लाह हम तेरी ही इबादत करते हैं और तुझी से मदद मांगते है
(5) 🤲और हमें सीधे रास्ते की हिदायत अता फरमा
(6)🤲 उन लोगो के रास्ते की  जिन पर तूने इनाम( फ़ज़ल ) किया
(7)😭 न कि  उन लोगों के रास्ते की जिन पर ग़ज़ब नाजिल हुआ है और न उनके रास्ते की जो भटके हुए है

क़ुरआन शरीफ हिंदी में  सूरह फातिहा 

 तर्जुमा और तफ्सील के साथ // QURAN IN HINDI-  SURAH FATIHA  Tafseer in Hindi


اَلۡحَمۡدُ لِلّٰہِ رَبِّ الۡعٰلَمِیۡن

 (1,)तमाम तारीफ़ें अल्लाह की हैं जो तमाम जहानों का परवर्दिगार है। 
तफसीर 
इस्लाम जो अदब और तहज़ीब इन्सान को सिखाता है उसके क़ायदों में से एक क़ायदा ये भी है कि वो अपने हर काम की शुरुआत ख़ुदा के नाम से करे। इस क़ायदे की पाबन्दी अगर सोच-समझकर और सच्चे दिल से की जाए तो इससे लाज़िमी तौर पर तीन फ़ायदे हासिल होंगे- एक ये कि आदमी बहुत से बुरे कामों से बच जाएगा, क्योंकि ख़ुदा का नाम लेने की आदत उसे हर काम शुरू करते वक़्त ये सोचने पर मजबूर कर देगी कि क्या हक़ीक़त में मैं इस काम पर ख़ुदा का नाम लेने का हक़ रखता हूँ?
दूसरा ये कि जायज़ और सही और नेक कामों की शुरुआत करते हुए ख़ुदा का नाम लेने से आदमी की ज़ेहनियत (बुद्धि) बिलकुल ठीक रुख़ अपना लेगी और वो हमेशा सबसे सही नुक्ते से अपने काम की शुरुआत करेगा।
तीसरा और सबसे बड़ा फ़ायदा ये है कि जब वो ख़ुदा के नाम से अपना काम शुरू करेगा तो उस काम में ख़ुदा उसकी मदद करेगा और उस काम के करने की उसे ताक़त देगा, उसकी कोशिश में बरकत डाली जाएगी और शैतान की रुकावटों और बिगाड़ों से उसे बचाया जाएगा। ख़ुदा का तरीक़ा ये है कि जब बन्दा उसकी तरफ़ तवज्जोह करता है तो वो भी बन्दे की तरफ़ तवज्जोह करता है।
जैसा कि हम इस सूरा के तआरुफ़ (परिचय) में बयान कर चुके हैं कि सूरा फ़ातिहा असल में तो एक दुआ है, लेकिन दुआ की शुरुआत उस हस्ती की तारीफ़ से की जा रही है जिससे हम दुआ माँगना चाहते हैं। इसमें मानो ये बात सिखाई जा रही है कि दुआ जब माँगो तो अदब और मुहज़्ज़ब तरीक़े से माँगो। ये कोई तहज़ीब नहीं है कि मुँह खोलते ही झट अपना मतलब पेश कर दिया। अदब और तहज़ीब का तक़ाज़ा है कि जिससे दुआ कर रहे हो, पहले उसकी ख़ूबी को, उसके एहसानों को और उसके मर्तबे को तस्लीम करो।
तारीफ़ हम जिसकी भी करते हैं, दो वजहों से किया करते हैं। एक ये कि वो ख़ुद में हुस्नो-ख़ूबी और कमाल रखता हो। ये देखे बिना कि हम पर उसकी इन मेहरबानियों का क्या असर है। दूसरा ये कि वो हमारा मुहसिन (उपकारक) हो और हम नेमत को तस्लीम करने के जज़्बे से लबरेज़ होकर उसकी ख़ूबियाँ बयान करें। अल्लाह की तारीफ़ इन दोनों हैसियतों से है। ये हमारी ज़बान हर वक़्त उसकी तारीफ़ बयान करने में लगी रहे।
और बात सिर्फ़ इतनी ही नहीं है कि तारीफ़ अल्लाह के लिये है बल्कि सही ये है कि तारीफ़  अल्लाह ही के लिये  है। ये बात कहकर एक बड़ी हक़ीक़त पर से पर्दा उठाया गया है और वो हक़ीक़त ऐसी है जिसकी पहली ही चोट से मख़लूक़-परस्ती (स्रष्टि-पूजा) की जड़ कट जाती है। दुनिया में जहाँ, जिस चीज़ और जिस शक्ल में भी कोई हुस्न (सौन्दर्य), कोई ख़ूबी, कोई कमाल (पूर्णता) है, उसका सरचश्मा अल्लाह ही की ज़ात है, किसी इन्सान, किसी फ़रिश्ते, किसी देवता, किसी सितारे ग़रज़ किसी मख़लूक़ का कमाल भी उसका अपना नहीं है, बल्कि अल्लाह का दिया हुआ है। इसलिये अगर कोई इसका हक़दार है कि हम उसके गिर्वीदा (दीवाना) और परस्तार, एहसानमन्द और शुक्रगुज़ार, नियाज़मंद और खादिम बनें तो वो खालिक़े-कमाल है, न कि कमालवाला।

QURAN IN HINDI SURAH FATIHA - सूरह फातिहा

الرحمن الرحيم

(2) जो सब पर  मेहरबान  बहुत मेहरबान हैं

 Surah FatihaTafseer in Hindi

तफसीर
इन्सान की ख़ुसूसियत है कि जब कोई चीज़ उसकी निगाह में बहुत ज़्यादा होती है, तो वो मुबालग़े (अतिश्योक्ति) के सीग़ों में उसको बयान करता है। अगर एक मुबालग़े का लफ़्ज़ बोलकर वो महसूस करता है कि उस चीज़ की फ़रावानी का हक़ अदा नहीं हुआ, तो फिर वो उसी मानी का एक और लफ़्ज़ बोलता है,यानी उस दिन का मालिक है जबकि तमाम अगली-पिछली नस्लों को जमा करके उनकी ज़िन्दगी के कारनामों का हिसाब लिया जाएगा और हर इन्सान को उसके अम्ल का पूरा सिला या बदला मिल जाएगा। अल्लाह की तारीफ़ में रहमान और रहीम कहने के बाद बदला दिये जाने के दिन का मालिक कहने से ये बात निकलती है कि वो ख़ाली मेहरबान ही नहीं है, बल्कि मुंसिफ़ (न्यायाधीश) भी है, और इन्साफ़ करनेवाला भी ऐसा कि जो बाइख़्तियार है और आख़िरी फ़ैसले के दिन वही पूरे इक़्तिदार का मालिक होगा। अगर वो किसी को सज़ा देना चाहेगा तो कोई भी उसमें रुकावट न बन सकेगा और इसी तरह अगर वो किसी को इनाम देना चाहेगा तो कोई भी उसमें रुकावट न बन सकेगा। इसलिये हम उसके रब होने और उसकी रहमत की वजह से उससे मुहब्बत ही नहीं करते, बल्कि उसके इन्साफ़ की वजह से उससे डरते भी हैं। और ये एहसास भी रखते हैं कि हमारे अंजाम की भलाई और बुराई पूरे तौर पर उसी के इख़्तियार में है। ताकि वो कमी पूरी हो जाए जो उसके नज़दीक मुबालग़े में रह गई है। अल्लाह की तारीफ़ (प्रशंसा) में  रहमान  (अत्यंत करुणामय) का लफ़्ज़ इस्तेमाल करने के बाद फिर  रहीम  (अत्यंत दयावान) का लफ़्ज़ बढ़ा देने में भी यही बात छिपी हुई है।  रहमान  अरबी ज़बान में बड़े मुबालग़े का सीग़ा है, लेकिन अल्लाह की रहमत (दयालुता) और मेहरबानी अपनी मख़लूक़ पर इतनी ज़्यादा है, इतनी फैली हुई है, ऐसी बेहदो-हिसाब है कि उसके बयान में बड़े से बड़ा मुबालग़े का लफ़्ज़ बोलकर भी जी नहीं भरता। इसलिये उसकी मिसाल ऐसी है जैसे हम किसी शख़्स की फ़य्याज़ी (दानशीलता) के बयान में सख़ी (दाता) का लफ़्ज़ बोलकर जब तिश्नगी (यानी कुछ कमी) महसूस करते हैं तो उस पर  दाता  का लफ़्ज़ बढ़ा देते हैं। रंग की तारीफ़ (प्रशंसा) में रब  गोरा  को काफ़ी नहीं पाते तो उस पर चिट्टे का लफ़्ज़ और बढ़ा देते हैं। लम्बे क़द के ज़िक्र में जब  लम्बा  कहने से तसल्ली नहीं होती तो उसके बाद  तड़ंगा  भी कहते हैं,,
यानी उस दिन का मालिक है जबकि तमाम अगली-पिछली नस्लों को जमा करके उनकी ज़िन्दगी के कारनामों का हिसाब लिया जाएगा और हर इन्सान को उसके अम्ल का पूरा सिला या बदला मिल जाएगा। अल्लाह की तारीफ़ में रहमान और रहीम कहने के बाद बदला दिये जाने के दिन का मालिक कहने से ये बात निकलती है कि वो ख़ाली मेहरबान ही नहीं है, बल्कि मुंसिफ़ (न्यायाधीश) भी है, और इन्साफ़ करनेवाला भी ऐसा कि जो बाइख़्तियार है और आख़िरी फ़ैसले के दिन वही पूरे इक़्तिदार का मालिक होगा। अगर वो किसी को सज़ा देना चाहेगा तो कोई भी उसमें रुकावट न बन सकेगा और इसी तरह अगर वो किसी को इनाम देना चाहेगा तो कोई भी उसमें रुकावट न बन सकेगा। इसलिये हम उसके रब होने और उसकी रहमत की वजह से उससे मुहब्बत ही नहीं करते, बल्कि उसके इन्साफ़ की वजह से उससे डरते भी हैं। और ये एहसास भी रखते हैं कि हमारे अंजाम की भलाई और बुराई पूरे तौर पर उसी के इख़्तियार में है।

مالك يوم الدين

  
(3). जो रोज़े जजा बदले के दिन का मालिक है,
तफसीर
اِیَّاکَ نَعۡبُدُ وَ اِیَّاکَ نَسۡتَعِیۡنُ
अल्लाह हम तेरी ही इबादत करते हैं और तुझी से मदद मांगते है

तफसीर

इबादत का लफ़्ज़ भी अरबी ज़बान में तीन मानों में इस्तेमाल होता है- (1) पूजा और परस्तिश, (2) इताअत (आज्ञापालन) और फ़रमाँबरदारी (3) बंदगी और ग़ुलामी। इस जगह पर एक ही साथ ये तीनों मानी मुराद हैं। यानी हम तेरे परस्तार (उपासक) भी हैं, फ़रमाँबरदार और बन्दे व ग़ुलाम भी। और बात सिर्फ़ इतनी ही नहीं है कि हम तेरे साथ ये ताल्लुक़ रखते हैं, बल्कि मानी वाक़ई हक़ीक़त ये है कि हमारा ये ताल्लुक़ सिर्फ़ तेरे ही साथ है। इन तीनों मानी में से किसी मानी में भी हमारा कोई दूसरा माबूद (उपास्य) हीं है।
यानी तेरे साथ हमारा ताल्लुक़ सिर्फ़ इबादत का ही नहीं है, बल्कि मदद चाहने और मदद लेने का ताल्लुक़ भी हम तेरे ही साथ रखते हैं। हमें मालूम है कि सारे जहान का रब तू ही है और सारी ताक़तें तेरे ही हाथ में हैं। सारी नेमतों का तू ही अकेला मालिक है। इसलिये हम अपनी ज़रूरतों की तलब में तेरी तरफ़ ही पलटते हैं, तेरे ही आगे हमारा हाथ फैलता है और तेरी मदद ही पर हमारा भरोसा है। इसी वजह से हम अपनी ये दरख़ास्त लेकर तेरी ख़िदमत में हाज़िर हो रहे हैं।
اِہۡدِ نَا الصِّرَاطَ الۡمُسۡتَقِیۡمَ
 हमें सीधे रास्ते की हिदायत अता फरमा
तफसीर

यानी ज़िन्दगी के हर शोबे और विभाग में सोच, अम्ल और बर्ताव का वो तरीक़ा हमें बता जो बिलकुल सही हो, जिसमें ग़लत देखने और ग़लत करने और बुरे अंजाम का ख़तरा न हो, जिसपर चलकर हम सच्ची कामयाबी और ख़ुशनसीबी (सौभाग्य) हासिल कर सकें। – ये है वो दरख़ास्त जो क़ुरआन का मुताला शुरू करते हुए बंदा अपने ख़ुदा के सामने पेश करता है। उसकी गुज़ारिश ये है कि आप हमारी रहनुमाई करें और हमें बताएँ कि क़यासी फ़लसफ़ों (काल्पनिक दर्शनों) की इस भूल-भुलैयों में बात की हक़ीक़त क्या है। अख़लाक़ का सही निज़ाम कौन-सा है, ज़िन्दगी की इन बेशुमार पगडंडियों के बीच फ़िक्र व अम्ल (चिंतन और कर्म) का सीधा और साफ़ रास्ता कौन-सा है।
صِرَاطَ الَّذِیۡنَ اَنۡعَمۡتَ عَلَیۡہِمۡ

उन लोगो के रास्ते की  जिन पर तूने इनाम( फ़ज़ल ) किया
तफसीर
ये उस सीधे रास्ते की पहचान है जिसका इल्म हम अल्लाह से माँग रहे हैं, यानी वो रास्ता जिसपर हमेशा से तेरे पसंदीदा बन्दे चलते रहे हैं। ,,वो बे-ख़ता रास्ता कि पुराने ज़माने से आज तक जो शख़्स और जो गरोह भी उस पर चला वो तेरे इनामों का हक़दार हुआ और तेरी नेमतों से मालामाल होकर रहा।

غير المغضوب عليهم ولا الضالين 

ना कि  उन लोगों के रास्ते की जिन पर ग़ज़ब नाजिल हुआ है और न उनके रास्ते की जो भटके हुए है,

तफसीर

यानी  इनाम  पानेवालों से हमारी मुराद वो लोग नहीं हैं जो देखने में जो आरज़ी (वक़्ती) तौर पर तेरी दुनियावी नेमतों से मालामाल ,तो होते हैं, मगर असल में वो तेरे ग़ज़ब के हक़दार हुआ करते हैं और अपनी कमयाबी और ख़ुशनसीबी की राह भूले हुए होते हैं। इस सल्बी तशरीह (नकरात्मक व्याख्या) से ये बात ख़ुद खुल जाती है कि इनाम से हमारी मुराद हक़ीक़ी और हमेशा रहनेवाले इनाम हैं,  न कि वो वक़्ती और नुमाइशी इनाम जो पहले भी फ़िरऔनों, नमरूदों ,और क़ारूनों को मिलते रहे हैं ,,और आज भी हमारी आँखों के सामने बड़े-बड़े ,ज़ालिमों, बदकिरदारों और गुमराहों को मिले हुए हैं।
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As salamualaikum everyone All Friends ❤️





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